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जलाना और जल प्रवाह एक प्राकृतिक प्रकिया

प्रकृति से छेङछाङ और प्राकृतिक संसाधनो का दोहन आज की स्थिति के लिये जिम्मेदार,कानुन बनाकर रोक लगाये सरकार

वाराणसी। करोना काल मे हिंदुओ द्वारा अंतिम संस्कार की दोनो मुख्य विधि जलाना और जल प्रवाह कराना तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा के लोगो के निशाने पर है और इस पद्धति की आलोचना हो रही है। इस संबंध में वरीष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद राय ने सरकार से कानून बनाकर रोक लगाने की मांग की है।

उन्होंने कहा कि करोना काल मे जहा एकाएक लोगो के मरने की दर बढ गयी तो स्वाभाविक है हिंदु मतावलंबी अंतिम संस्कार के लिये घाटो पर ही पहुचेगे और निश्चित रूप से घाटो पर लकङियो की उपलब्धता पर इसका असर पङेगा।

दुरदराज के गांवो मे लोगो ने वैकल्पिक तौर पर गंगाजी मे जल प्रवाह करना शुरु किया तो अचानक गंगाजी मे लाशो का अंबार लग गया और देश विदेश की मिडिया मे यह खबर ट्रेन्ड करने लगा हिंदु धर्म सबसे प्राचीन और पुरातन धर्म है और इसका फैलाव हिंदुस्तान के आस पास के क्षेत्रो मे है ,हिंदुओ मे अंतिम संस्कार की दोनो मुख्य विधि एक दम नैसर्गिक है और प्रकृति से जुङा हुआ है।

जरा आप कल्पना करे जब मनु ने इस देश मे प्रथम मानव के रूप मे जन्म लिया और यह संख्या बढी ,स्वाभाविक है मृत शरीर को सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार के लिये तब के आदि पुरुषो ने तरीके पर विचार किया होगा ।यह भारतवर्ष जहा जंगालात और सुखी लकङियो की कोई कमी नही थी तब के लोगो को यह काफी सरल और आसान लगा होगा कि मृत शरीर को जंगल मे सुखी लकङिया इकट्ठा कर जला दिया जाय।लेकिन बरसात मे जब चारो तरफ जल और जलप्लावन का दृश्य हो तो सुखी लकङिया जुटाना निश्चित रुप से दुरूह कार्य था तो विकल्प के रूप मे लोगो ने बढी हुयी नदियो मे जल प्रवाह को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाना लगा।

कहने का तात्पर्य यह है कि आर्याव्रत मे जो मृत शरीर को जलाने और जल प्रवाह की जो परम्परा शुरू हुयी और देश के भौगौलिक और प्राकृतिक परिस्थितियो के एकदम अनुरुप था यानि मानव के विकास के शूरुआती काल से लेकर पिछले पचास साल पहले तक मृत शरीर को जलाने के लिये ना तो लकङियो की कोई कमी थी नाही नदियो के जल प्रवाह मे कोई कमी थी।इसके उलट जरा विचार करे दुसरे धर्म के अंतिम संस्कार के तरीको पर तो आप जरा सहज अनुमान लगाइये कि अरब देशो मे जहा इस्लाम का उद्भव हुआ वे क्या अपने मृत शरीरो को जलाने के लिये लकङी या जल प्रवाह के लिये सोच भी नही सकते ?एकदम नही?क्योकि चारो तरफ रेगिस्तान ही रेगिस्तान तो उनके लिये यही मुफीद और सहज था कि वे मृत शरीर को खाली जगह देखकर दफना दे यही हालत ईसाई मतावलंबियो के साथ भी आई होगी ,चारो तरफ बर्फबारी हो रही है ठंडे मुल्क है वे भी हिंदुओ की तरह मृत शरीर को जलाने और जल प्रवाह के बारे मे सोच भी नही सकते

लिहाजा उनके यहा भी दफनाने को ही सर्वोत्तम साधन माना गया और परम्पर पीढी दर पीढी चलती गयी और आज वह दस्तुर बन चुका है।शहरीकरण और औद्दोगिकरण के तहत देश मे जंगलात कटते गये वही पन बिजली के लिये हर नदी पर बङे बङे बांध बना दिये गये।नतिजा यह हुआ कि हिंदुओ को जो अपने अंतिम संस्कार की दोनो पद्धतियो मे लकङी और जल की कमी आङे आने लगी।धीरे धीरे शहरो मे तो जल प्रवाह को तो लगभग बंद करा दिया गया लेकिन गांवो मे यह परम्परा जारी रही और लोग जल प्रवाह करते रहे।मान्यताओ पर जाये तो गंगाजी के किनारे रह रहे लोग जल प्रवाह को जलाने से बेहतर मानते है और उनका मान्यता रही के कि गंगा मे मृत शरीर प्रवाहित करने से मा गंगा उसको स्वयं अपने मे समाहित कर मोक्ष प्रदान करती है।मैने अपने गांव के तमाम बुजुर्गो को इस मान्यता के समर्थन मे तर्क देते सुना है।काल परिस्थिति का चक्र कुछ ऐसा चला कि गंगाजी मे टीहरी डैम बन जाने के बाद गंगाजी स्वय गर्मियो मे नाले के शक्ल मे हो जा रही है,गाजीपुर जहा गंगाजी का पाट बहुत ही चौङा है और पानी भी बहुत रहता था अब पानी काफी कम रहता है तो जब गांव के लोगो ने गरीबी मे जलप्रवाह करना शुरु किया तो एक तो गंगाजी मे पानी नही दुसरे मरने वालो कि संख्या सैकङो मे ,सो लाशो का विभत्सतम रूप मे उतराना ही था।

8इस पुरे बहस का सार यह है कि गंगा मे जल प्रवाह एक सामान्य प्रक्रिया है करोना काल मे अत्यधिक लोगो का एक साथ काल का ग्रास बनना और गरीब लोगो द्वारा एक साथ गंगाजी मे जल प्रवाह करने से यह स्थिति उत्पन्न हुयी है सरकार को इस सम्बन्ध मे लोगो को जागरूक करना चाहिये और जरूरत समझे तो कानुन बनाकर भी इस परम्परा पर यथोचित रोक लगायी जानी चाहिये क्योकि जल प्रवाह आज की परिस्थिति मे पर्यावरण पर भी गंभीर संकट खङा कर रहा है

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