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डीआरडीओ की दवा केवल पांच दिन में ही कोविड को देगी मात

वाराणसी। कोविड की दवा का निर्माण करने वाले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के सहयोगी संस्थान इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (आइएनएमएएस) का दावा है कि 2डीजी (2 डीआक्सी-डी ग्लूकोज) दवा चार-पांच दिन में ही कोरोना के दुष्प्रभाव पर कारगर साबित होगी। आइएनएमएस के निदेशक डा. अनिल मिश्र के अनुसार हैदराबाद के सेंटर फार सेल्युलर एंड मालिक्यूलर बायोलाजी (सीसीएमबी) स्थित डा. रेड्डी लैब के प्री-क्लीनिकल ट्रायल और क्लीनिकल ट्रायल में पाया गया कि गंभीर और मध्यम रूप से कोविड पीडि़तों की रिपोर्ट दवा सेवन के चार से पांच दिन में निगेटिव आ गई, जबकि रेमडेसिविर इंजेक्शन से रिकवरी में आठ दिन लगते हैं। बच्चों पर इस दवा का ट्रायल नहीं हुआ है, मगर यह दवा मानव शरीर में मौजूद वायरस को तेजी से निष्प्रभावी करती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि वयस्क हो या बच्चा, दोनों पर दवा काम करेगी।

कैंसर की दवा हुई कोविड में सफल 

सबसे खास बात यह है कि कैंसर के इलाज के लिए इस दवा पर दुनियाभर में 1940 से काम हो रहा है, मगर भारत ने इसे कोविड को हराने का प्रमुख हथियार बना दिया है। 2डीजी पर 1972 से काम कर रहे प्रो. विनय जैन के कुल 20 शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित हो चुके हैं। वहीं कैंसर को लेकर भारत में दो बार सफल क्लीनिकल ट्रायल भी किया जा चुका है। प्रोफेसर जैन बताते हैं कि यह दवा ग्लूकोज की तरह होती है, मगर इसके रासायनिक सूत्र में एक आक्सीजन की कमी होती है।ऐसा देखा गया है कि कोरोना वायरस से प्रभावित कोशिकाओं में ग्लूकोज की खपत काफी बढ़ जाती है। इससे वायरस कैंसर कोशिकाओं या ट्यूमर की तरह ही बहुत तेजी से रेप्लीकेट (दोहराना) कर अपनी संख्या बढ़ाता है।

इस दवा का उपयोग वायरस धोखे से ग्लूकोज समझकर करता है और वहीं मात खा जाता है। दरअसल, दवा की वजह से मानव कोशिकाओं का ग्लाइको प्रोटीन कोट या रिसेप्टर बदल जाता है और वायरस कोशिकाओं के अंदर प्रवेश नहीं कर पाता। ग्लूकोज की आपूर्ति जब वायरस को नहीं होती तब उसकी एटीपी यानी ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है और वृद्धि ठहर जाती है। यह प्रक्रिया चार से पांच दिन के अंदर अपना असर दिखा देती है। इसका कोई साइडइफेक्ट भी नहीं है। प्रो. जैन ने कहा कि बच्चों को यह दवा देने में कोई समस्या नहीं आएगी, मगर जल्द ही उन पर ट्रायल किया जाएगा।

पिछले साल अप्रैल में मिली मंजूरी

डीआरडीओ के प्रो.जी सतीश रेड्डी ने दवा को तैयार कराने और मंजूरी आदि कार्यो में व्यक्तिगत रुचि लेकर सबको प्रोत्साहित किया। क्लीनिकल ट्रायल में डा. अनंत नारायण भट्ट और डा. सुधीर चांदना ने अहम भूमिका निभाई है। डा. रेड्डी व अन्य विज्ञानियों के साथ उच्चस्तरीय मीटिंग हुई। इसके बाद पिछले साल अप्रैल में इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) में क्लीनिकल ट्रयल के लिए आवेदन डाला गया था। डा. जैन दिल्ली एम्स और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निम्स) में अपनी सेवा दे चुके हैं। उन्होंने जर्मनी में लंबे समय तक रिसर्च किया है। यह दवा जल्द ही बाजार में आएगी।

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