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आज ही  के दिन प्राचीन नगरी काशी को मिला था वाराणसी नाम, 65 साल का हुआ शहर

वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी विश्व की सबसे प्राचीन नगरी में से एक मानी जाती है। इसका इतिहास सदियों पुराना है। इस नगरी का जिक्र मत्स्य पुराण में भी किया गया है। जिस प्रकार काशी नगरी खुद में विविध रंगों को समेटे हुई है, ठीक वैसे ही इसे कई नामों से भी जाना जाता है। इसके हर नाम के पीछे एक अलग मान्यता है, पुरातन काल से अब तक इसे कई नामों से बुलाया जाता है। वहीं पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार, ‘वरुणा’ और ‘असि’ नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। पुराणों के अनुसार मनु से 11वीं पीढ़ी के राजा काश के नाम पर काशी बसी। 24 मई को गजट के अनुसार वाराणसी अपना 65वां जन्मदिन मनाएगी।

प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद ने वाराणसी को 24 मई 1956 को आधिकारिक मान्यता प्रदान की थी। 1965 में प्रकाशित वाराणसी गजेटियर के दसवें पृष्ठ पर जिले का प्रशासनिक नाम वाराणसी किए जाने की तिथि 24 मई 1956 अंकित है। यह महज संयोग है कि उक्त तिथि को भारतीय पंचांग में दर्ज तिथि के अनुसार वैशाख पूर्णिमा और चंद्रग्रहण का योग था। 

स्कंद पुराण के काशी खंड में नगर की महिमा 15 हजार श्लोकों में कही गई है। मत्स्य पुराण में भगवान शिव वाराणसी का वर्णन करते हुए कहते हैं वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन क्षेत्रे मम प्रिये।। अर्थात हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा बहती है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है।

नगरी एक, नाम अनेक 

वाराणसी को अविमुक्त, आनंदवन, रुद्रवास के नाम भी जाना जाता रहा है। इसके करीब 18 नाम – वाराणसी, काशी, फो लो – नाइ (फाह्यान द्वारा प्रदत्‍त नाम), पो लो – निसेस (ह्वेनसांग द्वारा प्रदत्‍त नाम), बनारस (मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्‍त), बेनारस, अविमुक्त, आनन्दवन, रुद्रवास, महाश्मशान, जित्वरी, सुदर्शन, ब्रह्मवर्धन, रामनगर, मालिनी, पुष्पावती, आनंद कानन और मोहम्मदाबाद आदि नाम भी पुरातन काल में लोगों की जुबान पर रहे हैं। 24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका सर्वमान्‍‍‍य नाम वाराणसी के तौर पर स्वीकार किया गया था।

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